शनिवार, १९ दिसम्बर २००९

अवतार : "इको फे्रंडली" विज्ञान फंतासी


बारह सौ करोड़ रूपए की लागत और पंद्रह साल की मेहनत के बावजूद जेम्स कैमरून की फिल्म "अवतार" आपको चमत्कृत ना करे, यह कैसे मुमकिन है। भावना और तकनीक की सिनेमाई यारी-दुश्मनी के बावजूद "अवतार" एक खूबसूरत फिल्म है। यह हमारे समय से आगे की फिल्म है। हम खुशकिस्मत हैं कि अपने समय में यह फिल्म देख रहे हैं। एक सौ बारह साल के सिनेमा के इतिहास में यह गर्व करने का भी मौका है कि चामत्कारिक कथा कहने की कला हमारे पास हजारों सालों से हैं, लेकिन उसी को आंखों से पर्दे पर देखने का सुकून भी अब हम ले सकते हैं।कथानक के लिहाज से अवतार बहुत चामत्कारिक फिल्म नहीं है। यह धरती के मनुष्यों के लालच की पोल खोलती है और सही मायनों में एक इको फ्रेंडली साइंस फैंटेसी है। यह मनुष्य और एक दूसरी दुनिया के नेवीज की रिश्ेतों की कहानी है। वैज्ञानिक ग्रेस आगस्टीन ने इन लोगों की जमीन पैंडोरा को खोज की है और मनुष्यों का एक पूरा दल इनकी जमीन के भीतर छुपे खनिज पर नजर गड़ाए है। जैक सुली को अवतार के जरिए इनकी दुनिया में भेजा जाता है। वह उनकी आदतों, रहन सहन को समझता है। उनकी "इको फें्रडली" जीवन शैली और मां ऎवा में उनकी आस्था से अभिभूत हो जाता है। उसे उसी दुनिया की लड़की नेतिरि से प्यार हो जाता है। इधर, आदमियों ने अपने गोला बारूद के साथ उन पर हमला कर दिया है। जैक सुली चूंकि मनुष्यों के लालच से वाकिफ है और नेवीज के प्रकृति प्रेम और सादगी से भी। वह मध्यस्थ बनने की कोशिश करता है लेकिन अब ना तो मनुष्य उसकी बात मानने को तैयार हैं और ना ही अपनी असलियत बताने के बाद नेवीज उस पर भरोसा करना चाहते हैं। बेहतरीन दृश्यों और भावनाओं के साथ वह अंतत: वह नेवीज का भरोसा जीतता है और मनुष्यों के खिलाफ युद्ध करने में वह नेवीज की मदद करता है। एक रोमांचक और रोंगटे खड़े कर देने वाली जंग में मनुष्य का लालच पराजित होता है। जैक सुली का अवतार एक "नेवी" के रूप में हो जाता है।तकनीक तो बेमिसाल है ही। हवा में लटकती विशाल चट्टानें। विमानों से भी तेज उड़ते शिकारी पक्षी। लंबी थूथन वाले नेवीज के वफादार घोड़े। उनकी नई भाषा और व्याकरण। मनुष्यों के अत्याधुनिक युद्धक विमान। सब कुछ एक जादुई दुनिया है। कैमरून के कथा कहने के जादुई अंदाज में ही दर्शक होने के नाते हम नेवीज की दुनिया में इतने घुल मिल जाते हैं कि आखिरी लड़ाई में हम मनुष्यों की हार पर जश्न मना रहे हैं।यह "टर्मिनेटर" के उस विस्मयकारी अहसास से बिल्कुल अलग है जब मशीनों से मनुष्य हार रहा है। यहां वह प्रकृति से हार रहा है और इस हार पर दर्शक अभिभूत होता है। धरती के खत्म होने की आशंका में कोपेनहेगन की माथापच्ची से कहीं ज्यादा आतंकित कर देने वाले अहसास से हम रूबरू होते हैं। नेवीज अपनी दुनिया पर हो रहे हमले को आसमानी मुसीबत कहते हैं। उन्होंने अपनी जमीन को बहुत खूबसूरत बनाया है। पहाड़, झरने, जानवर, देवी ऎवा के विशालकार पेड़। आत्माओं से संवाद करने का जादुई अहसास। सब कुछ हिंदुस्तानी लगता है। नाम तो है ही। इतना धन खर्च करने और सिनेमा के प्रति अटूट धैर्य के लिए जेम्स कैमरून को सलाम किया जाना चाहिए।

सोमवार, १४ दिसम्बर २००९

वल्र्ड क्लास के सपने

किसी शहर को "वल्र्ड क्लास" बनाने के लिए मुझे नहीं लगता कि जेडीए, नगर निगम या सरकार जैसी गैर-जिम्मेदार संस्थाओं की कोई बड़ी भूमिका होती होगी। मुझे "वल्र्ड क्लास" शब्द से आपत्ति है। यह "थर्ड क्लास" जैसा ध्वनित होता है। केंद्र, राज्य और अब शहर की महापौर को भी शामिल करें, तो सारी कवायद एक राजनीतिक भाषण की परिणति है। तो "वल्र्ड क्लास" का मतलब मैं यहां एक "आदर्श, आधुनिक, वैज्ञानिक और मानवीय सोच वाले शहर" से जोड़कर देखता हूं, उसमें सड़कें और पुल तो बहुत मामूली चीजें हैं। सुख-सुविधाओं का संबंध भी आपके पास उपलब्ध धन से है। मॉल का क्या फायदा, अगर आपकी जेब में खरीदारी का पैसा ही ना हो। तो किसी भी शहर को वल्र्ड क्लास बनाते हैं वहां की संस्कृति, विरासत, शहर में रहने वाले लोग, खाने-पीने की स्वस्थ आदतें, प्रदूषण रहित वातावरण, शिक्षा का स्तर, विज्ञान, संगीत और दूसरी कलाओं के लोगों की शहर में दिलचस्पी। नौकरशाहों को कमीशन खिलाने वाली ढांचागत विकास की ज्यादा से ज्यादा योजनाओं की घोषणा करके ये मान लिया गया है, इनके पूरा होते ही शहर "वल्र्ड क्लास" हो जाएगा।शहर की यूनिवर्सिटी में अध्यापकों की बेहद कमी, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं, सरकारी स्कूलों में शून्य पढाई। निजी जेबकतरे स्कूलों पर सरकारी वरदहस्त और पढ़ाई का स्तर गिरा हुआ। कॉलोनियां अस्त-व्यस्त और ट्रेफिक दिनोंदिन होता बेकाबू। प्रदूषण बढ़ गया है। लोग सड़क पर पान मसाला पीक थूकते हुए चलते हैं। बदतमीजी से हॉर्न बजाते हैं। मासूम स्कूली बच्चे सड़कें पार करने से डरते हैं। यूरोप में ऎसे समय टे्रफिक रूक जाता है। कभी अजमेर रोड, तो कभी कानोता और कभी जगतपुरा। सरकारें नया जयपुर बसाने की ऎलान करती हैं और भू-माफिया सक्रिय हो जाते हैं। 84-85 में मैं गांव के सरकारी स्कूल में चौथी कक्षा में था। अखबार में पढ़े एक लेख में था कि जयपुर में नई रिंग रोड बनेगी और उसके बाद शहर का नक्शा बदल जाएगा। लेख में वह नक्शा छापा भी गया था। मैंने रिंग रोड शब्द पहली बार सुना था। उसके बाद अठारह साल से इस शहर में रहते कितनी ही बार अखबारों में रिंग रोड के बारे में पढा। लेकिन वो नक्शों में ही चल रही है। कभी दो किलोमीटर पीछे, और कभी चार किलोमीटर आगे। इसे कछुआ चाल कहना भी बुरा है, क्योंकि कछुआ हमारी सरकारों, नीति नियंताओं से कहीं अघिक जिम्मेदार प्राणी है। तो शहर "वल्र्ड क्लास" कैसे बनेगा? जब निगम के ट्रक या तो कचरा गलियों से उठाते नहीं हैं। उठाया तो उसे सड़कों पर फैलता जाता है। आवारा कुत्ते, मवेशी तो बोनस हैं। पांच साल पहले जयपुर आए एक विदेशी फिल्मकार की याद है जिसने यादराम नाम के ट्रेफिक सिपाही से जौहरी बाजार में पूछा कि क्या मैं अपनी कार "नो पार्किग" में खड़ी कर सकता हूं? उसने मना कर दिया था। "पार्किग" की तरफ इशारा करके समझाया कि वह उधर है। विदेशी ने देखा कि जहां "कार पार्किग" लिखा है वहां एक मोटा-तगड़ा सांड बैठा था। उसने सिपाही से सांड को हटाने का आग्रह किया। टूटी फूटी अंग्रेजी में जवाब आया, "दिस इज नोट माई डूटी, दिस वर्क बिलोंग्स टू नगर निगम।" विदेशी को बाद में जयपुर घूमते हुए हर जगह जानवर नजर आए। उसने यादराम को धन्यवाद कहते हुए एक डॉक्यूमेंट्री बनाई, जिसका नाम है, "द एनिमल सिटी।" घटना के पांच साल बाद भी शहर में कुछ नहीं बदला है। यहां सब जानवरों के लिए जगह दिखती है लेकिन आदमी के पैदल चलने के रास्ते पर अतिक्रमण है। इस फिल्म की सीडी फिल्मकार के इस आग्रह के साथ जयपुर आई कि इसे यादराम को जरूर दिखाइएगा, लेकिन यादराम तब तक जीवित नहीं था। एमआई रोड पर ड्यूटी करते समय एक पेड़ के टूटकर गिरने से उसकी मौत हो गई थी।

शुक्रवार, ११ दिसम्बर २००९

रॉकेट सिंह : ईंधन कम, आवाज ज्यादा


'अब तक छप्पनÓ और 'चक दे इंडियाÓ की कामयाबी के बाद शिमित अमीन से उम्मीदें बढ़ती है। जब फिल्म यशराज बैनर की हो और लेखक जयदीप साहनी तथा लीड में रणबीर कपूर हों तो ये उम्मीद और ज्यादा बढ जाती हैं। पोस्टर और प्रचार देखकर यूं लगता है कि रॉकेट सिंह एक हास्य फिल्म है लेकिन ऐसा नहीं है। निर्देशक शिमित अमीन और लेखक जयदीप साहनी ने जो जादू हॉकी के मैदान में एक कोच को लाकर अपनी पिछली फिल्म में किया ऐसा ही वे बिजनेस के मैदान में करने के इरादे से एक सेल्समैन को बिजनेसमैन बनाने की कहानी का ताना बना बुनते हैं लेकिन सीधी सपाट कहानी में बीच बीच में इसके वृत्त चित्र जैसा आभास होने लगता है।कहानी हरप्रीत सिंह बेदी यानी रणबीर कपूर की है। पढाई में कमजोर है लेकिन उसका कहना है कि दिमाग उसका कमजोर नहीं है। कैट का इम्तहान देने के बजाय वह तय करता है कि वह सेल्समैन बनेगा। उसके दिमाग में ईमानदारी का कीड़ा है। वह 'कारपोरेट जंगल में एक महात्माÓ है। उसके बॉस पुरी के मुताबिक उसमें वो काबिलियत है कि वह ऊपर भी जा सकता है और एकदम नीचे भी। लगातार नाकामी से उसके ऑफिस में ही उसका मजाक उड़ाया जाता है। उस पर कागज के रॉकेट फेंके जा रहे हैं। उसका बॉस सार्वजनिक रूप से उसकी तौहीन करता है। हरप्रीत को एहसास होता है कि उसे कुछ नया करना चाहिए। उसने उसी ऑफिस में रहते हुए यह एहसास होता है कि ग्राहकों के रिश्ते में ईमानदारी और उनका भरोसा जीतना महत्त्वपूर्ण है। उसने अपनी ही कंपनी रॉकेट सेल्स कारपोरेशन अपने ही ऑफिस से चलानी शुरू कर दी। एक से दो, दो से तीन, तीन से चार, चार से पांच और पार्टनर्स यह संख्या क्लाइमेक्स तक आठ हो जाती है। इस कंपनी के बनने, फिर बिगडऩे और फिर बनने की कहानी में ही बिजनेस करने के उसूलों पर एक लंबी चौड़ी पढ़ाई दर्शकों की हो जाती है। सेल्समैन की पीड़ा फिल्म में है लेकिन वह मेहमान की तरह है। मूल सूत्र है कि हर आदमी महत्त्वपूर्ण है, बशर्ते उसे सपनों और समर्पण पर यकीन हो।तकनीकी तौर पर फिल्म समृद्ध है। सेल्स बाजार की धोखाधड़ी पर तंज भी है। लेकिन बीच बीच में कहानी की रफ्तार धीमी हो जाती है। इंटरवल तक तो यह और भी धीमी है। सलीम-सुलेमान का संगीत ठीक ठाक है। वेक अप सिड और अजब प्रेम की गजब कहानी की कामयाबी के बाद रणबीर की स्टार वैल्यू का लाभ फिल्म को मिले तो अच्छा है। क्योंकि अब उनमें अभिनय का आत्मविश्वास दिखता है। बाकी यह एक औसत मनोरंजक फिल्म है। इससे अब तक छप्पन जैसी संवेदना और चक दे इंडिया जैसा जुनून तो दिखता ही नहीं है।

गुरुवार, २६ नवम्बर २००९

चाह नहीं कि नेताओं के माइक पर गाया जाऊं

यह तय बात है कि जिंदगी में कभी फिल्म बनाई तो मैं उसमें देशभक्ति का कोई गाना नहीं रखूंगा। इसलिए नहीं कि इस देश का सम्मान नहीं करता, बल्कि इसलिए कि जब भी चुनाव होंंगे, हमारे नेता उन गानों का दुरुपयोग करेंगे। वे हर चुनाव में ऐसा करते हैं और हमारे मरहूम भले गीतकार प्रदीप, साहिर, मजरूह, कैफी की आत्माएं दुखती होंगी।जिन लोगों की बुनियाद ही जोड़-तोड़, बेईमानी पर टिकी हो वे लोग जनता की सेवा का दावा कैसे कर सकते हैं। हर चुनाव की तरह नगर निकायों के चुनाव में भी इन्हीं गानों का दौर लौट आया है।हमारी कला और सिनेमा के बिंबों का यह दुरुपयोग क्यों नहीं रोका जाना चाहिए? अमरीका की जूतों की कोई कंपनी गणेश का प्रतीक इस्तेमाल करती है तो हम इतना हंगामा खड़ा कर सकते हैं। वंदेमातरम कहा जाए या नहीं, यह बहुत बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन सकता है तो क्या हमारी सांगीतिक धरोहरों के दुरुपयोगों पर भी कोई रोक होनी चाहिए। माना कि यह संगीत लोकप्रिय संगीत की श्रेणी में है, लेकिन याद रखें कि जब कांग्रेस ने 'जय होÓ गाने के अधिकार खरीदे थे तो गुलजार साहब ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। हम सब इस बात से आहत होते हैं कि 'मेरा रंग दे बसंती चोलाÓ जैसा गाना बजना शुरू होने के साथ हमें भगतसिंह का बिंब दिखता है लेकिन दुर्भाग्य से अगले ही क्षण माइक यह बोलता है कि अमुक नाम के अमुक जाति वाले आदमी को आप वोट दें, क्योंकि यह गाना अब अगली बार पांच साल बाद सुनेंगे। भारत-चीन युद्ध की पृष्ठभूमि में बनी 'हकीकतÓ फिल्म का गाना 'अब तुम्हारे हवाले वतन साथियोÓ को जब भी मैं अपने म्यूजिक सिस्टम में सुनता हूं, तो मेरी आंखें नम होती हैं, लेकिन यही गाना जब चुनावी मौसम में एक रिक्शे पर बजता है तो मेरी आंखें सवाल पूछती है, ये धूर्त लोग कौन हैं जो एक बार फिर इस बात के लिए झूठ बाले रहे हैं कि वे जान-ओ-तन फिदा कर रहे हैं। ये तो वो लोग हैं जो नामांकन के दिन छह घंटे तक आम लोगों को जाम में फंसा सकते हैं क्योंकि उन्हें शक्ति प्रदर्शन करना है। ये वो लोग हैं जो पैसा खर्च कर पार्टी की टिकट खरीद लाते हैं। इन्हें इस वतन, इस शहर की मिट्टी से क्या लेना देना?देशभक्ति के गीतों के एलबमों की हालत तो यह हो गई है, जैसे ये इन नेताओं के लिए ही खैरात की तरह बनाए गए हैं। ये हमारे महान गीतकारों की विरासत हैं। संगीतकारों की साधना का फल है। उन्होंने इस देश को अपनी साधना से याद किया है।दुर्भाग्य से हमारे यहां कॉपीराइट एक्ट में इतने लोचे हैं कि इन लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी नहीं होती।हम सबने बचपन में राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी की एक कविता 'पुष्प की अभिलाषाÓ पढ़ी है, जिसमें फूल यह कहता है कि उसकी इच्छा सुरबाला के गहनों में गूंथे जाने या देवताओं की मूर्तियों पर चढ़ाए जाने की नहीं। उसे तो देश की सेवा में जाने वाले लोगों के रास्ते में फेंक दिया जाए ताकि वह उनके पैरों तले कुचले जाने का सौभाग्य मिले। हमारे इन गानों की खुद जुबान होती तो ये यही कहते, 'चाह नहीं कि नेताओं के माइक पर गाया जाऊं।Ó

सोमवार, २३ नवम्बर २००९

कुर्बान- ऊंची दुकान,सादा पकवान

करण जौहर खेमे के निर्देशक रेन्सिल डिसिल्वा की पहली बहुप्रचारित फिल्म "कुर्बान" की टैगलाइन है कि कुछ प्रेम कहानियां खून से लिखी जाती हैं लेकिन इस फिल्म एक बड़ा हिस्सा "फना" और पिछले साल आई "न्यूयॉर्क" से हूबहू मिलता है। हां, इसमें नया सिर्फ इतना है कि करीना कपूर ने सैफ अली के साथ टॉपलेस अंतरंग दृश्य दिए हैं और फिल्म के प्रचार में इसे भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है। यह कहानी अवंतिका और अहसान की है जो शादी करके अमरीका में काम कर रहे हैं। यह भूमिका करीना और सैफ कर रहे हैं। अचानक अवंतिका को पता लगता है की उसे इस्तेमाल किया जा रहा है। जो रोल "न्यूयॉर्क" में नील नितिन का है, वह यहां रियाज की भूमिका में विवेक ऑबेरॉय का है, जो एक चैनल में रिपोर्टर है। लेकिन सैफ को अधिक दिखाने की गरज में आधी से ज्यादा फिल्म आतंककारियों का न्यूज लेटर सी लगती है,। बच्चा बच्चा जानता है और यहां दुबारा बताया गया है कि किस तरह से गोरों ने तेल के नाम आतंकवाद पैदा कर दिया है। इस तथ्य में कोई बुराई नहीं है लेकिन दूसरा पहलू फिल्म में बहुत ही दबा हुआ चल रहा है। इस विषय पर पहले से ही इससे इतनी बेहतर फिल्में बन चुकी हैं, चाहे वह "खुदा के लिए" हो या "न्यूयॉर्क।" इस क्रम में कुर्बान तीसरे नंबर पर है।कहानी को जिस तरह आगे बढाया गया है वह सहज नहीं है। जब रियाज को यह पता चलता है कि उसकी प्रेमिका रेहाना के कत्ल में आतंकवादियों का हाथ है तो वह बजाय पुलिस को बताने के बजाय खुद ही उनकी गैंग में शामिल होेने का ढोंग करता है। यह अटपटा लगता है। एक जगह उसे अवंतिका मिलती है ओर आग्रह करती है कि वह उसे इन लोगों के दलदल से निकाले तो बजाय उसे बचाने के वह वापस घर भेज देता है। आखिरकार बम भी फट जाते हैं। लोग भी मरते हैं। आधी फिल्म बीत जाने के बाद यदि करीना का टॉपलेस दृश्य नहीं आ जाता, तब तक एक अजीब सा सन्नाटा दर्शकों में महसूस किया जा सकता है, जैसे वे "आतंकवादी कैसे बनते हैं" विषय पर बुलाई गई एक सेमिनार में बिठा दिए गए हों। लिहाजा आप सोचते हैं कि एक प्रेमकहानी देखने जा रहे हैं तो निराश होंगे। हां, एक पिटे पिटाए से कथानक पर आतंकवाद के मुद्दे पर आपको एक औसत सी फिल्म देखनी है, तो बुरी नहीं है। गाने ठीक हैं और फिल्माए ढंग से गए हैं। फिल्म की कहानी के अलावा फिल्मांकन में कोई कमी नहीं है। बहुत अच्छे से फिल्माया गया है और इसे एक हॉलीवुड थ्रिलर की तरह आप देख सकते हैं। बेशक खूबसूरत अमेरिकन लोकेशन्स और करीना-सैफ की पर्दे से बाहर की इश्किया समीकरणों से फिल्म को प्रांरभिक लाभ मिलेगा लेकिन यह आतंकवाद पर एक सतही सी सोच रखने वाली फिल्म है। आतंकवाद पर एक अधूरी कहानी और प्रेम कहानी तो वैसे भी अधूरी है, क्योंकि प्रेम वो नहीं जिसमें आप अपनी पीठ को नंगा दिखाएं। सैफ-करीना ठीक लगे हैं। ओमपुरी उम्दा हैं। किरण खेर सामान्य हैं।

ठिठुरती यादों की गुनगुनी परछाईंयां

अपनी ही सांसों से फंूक मारक हथेलियों को गर्म करने की कोशिश। नाक में जलती हुई लकडिय़ों का धुंआ घुस रहा है। चूल्हे के पास यूं बैठने को तीन चार लोगों की ही जगह दिखती है लेकिन 'थोड़ा और आगे सरक।Ó कहते हुए रसोई के चूल्हे के पास दस लोग जमा हो गए। चाचा दूलसिंह ने एक जलती लकड़ी चूल्हे से उठाई और अपनी बीड़ी के मुंह से टोचन करने लगे। धुएं में बीड़ी का धुंआ भी घुल गया है। मां चूल्हे पर रखी 'राबड़ीÓ को 'चाटुÓ से हिला रही है। गांव में सर्दियों का सबसे बड़ा पेय। जिस राबड़ी को मैं कभी पसंद नहीं करता था। सर्दियों में वह अमृततुल्य लगती थी। चूल्हे से उतरी नहीं कि 'सबड़केÓ मार मार के पूरा कटोरा पी गया। शरीर का तापमान बढ़ा। चूल्हे के सामने मां, बापू, चाचा, मौसी सब जमे हैं। दिसम्बर की सर्द रात है। आग अपनी शक्ल बदल रही है। कभी 'धपड़बोझÓ, कभी 'खीरेÓ तो कभी 'भोभर।Ó चूल्हे की चौपाल लंबी चलेगी। मुझे मेरे चचेरे भाई गोकुल के साथ हिदायत दी जाती है कि चुपचाप जाकर रजाई में घुस जाऊं। हम दस मिनट तक यही बहस करते हैं कि पहले तुम घुसो। रजाई इतनी ठंडी है। बर्फ सी लगती है। जो पहले घुसेगा वो गर्म तो पता नहीं कब होगा लेकिन ठिठुर जरूर जाएगा यह तय है। आखिरकार बीच का रास्ता मां ने तय किया था। एक दिन तुम घुसोगे, एक दिन गोकुल। मैं घर में सबसे छोटा था। मेरी मासूमियत गोकुल को अक्सर पिघलाती थी। वह पूरा पिघल ही नहीं जाए इससे बचने के लिए ठंडी रजाई में राहत पाता था।
सुबह कोहरा है। जैसे रात भर सूरज ने और सारे तारों ने सर्दी से बचने के लिए जैसे गीली लकडिय़ां जलाई हों। उसका फैल गया है। मजा आ गया। हम से मुंह से फूंक मारते हैं, मुंह से भी धुंआ निकल रहा है। जैसे पेट में कुछ सुलग रहा है। रात को चूल्हे में 'भोभरÓ ओटी गई थी। चिंगारी अभी बाकी है। चूल्हा जला है। कोयलों पर बाजरे की रात की बची हुई रोटी 'कुरकुरीÓ सेंक दी गई है। दोनों हथेलियों के बीच 'मरोड़ीÓ देकर उसे कांसे के कटोरे में 'चूराÓ गया है। गाढ़ा सा जमा हुआ हमारी लंबे सींग वाली भैंस का दही डाला गया है। हाथ की चारों अंगुलियां भूख के इशारे समझते हुए एक बड़े चम्मच में तब्दील हो गई हैं। सुबह के 'सबड़केÓ के साथ दही रोटी खा ली गई है। जो मटका पुराना हो गया उसी में पानी भरकर चूल्हे पर रख दिया गया है। गर्म पानी बाल्टी में डालकर चेतावनी के साथ मुझे कच्ची ईंटों से बने बाथरूम में घुसा दिया गया है। मैं मन ही मन उस आदमी को कोसता हूं जिसने मेरी उम्र के बच्चों के लिए स्कूल जाने का रिवाज बनाया।
मैं नंग-धड़ंग ठिठुरता हुआ बाथरूम में हूं। मुंह धोया। आंखें धोयी। 'तागड़ीÓ गीली कर ली है। ताकि मां की जांच में खरा उतरूं कि नहाकर आया हूं। कड़ाके की सर्दी ने हफ्ते में छह दिन सबको धोखा देना सिखा दिया है। संडे को मां खुद मोर्चा संभालती है। ठिठुरते हुए रोना धोना जारी है। पैरों पर जमी मैल की परतें, वो बिना साबुन ही रगड़ रही है। खाल खिंच रही है। ज्यादा शोर मचाना मना है, वरना दो चांटे तैयार हैं।
'टोपलाÓ लगाए गांव के सरकारी स्कूल में बैठा हूं। दरी बिछी है। आधे से ज्यादा बच्चों की नाक तार-सप्तक की तरह बज रही है। बीच में छींक और खांसी की लगातार आवाजें पूरी कक्षा में 'फ्यूजनÓ पैदा कर रहे हैं। आज बाहर धूप भी नहीं है। स्कूल की बिना किवाड़ वाली खिड़कियों पर दरी के ही पर्दे लटकाए हैं लेकिन छन छन के शीत लहर आ रही है। समवेत ध्वनियां हैं, जोर जोर से, 'एक एक ग्यारहा, एक दो बारहा, एक तीन तेरहा, एक चार चौदह, एक पांच पन्द्रह।Ó बहाना है कि रटा लगा रहे हैं। सच्चाई है कि जोर-जोर से बोलने में सर्दी कम लग रही है।

सोमवार, १९ अक्तूबर २००९

हंसो और कहो आल दा बेस्ट

यह तो अब माना ही जा सकता है कि मोहित शेट्टी का कहानी कहने का अपना तरीका है और उसमें वे लोगों को हंसाने की ताकत रखते हैं। दीवाली के मौके पर रिलीज उनकी फिल्म ऑल द बेस्ट में गोलमाल जैसा जादू तो नहीं है लेकिन वह गोलमाल रिटन्र्स के आसपास जरूर ठहरती है। खासकर इंटरवल के बाद कहानी में तेजी आती है और जब आप सिनेमाघर से बाहर निकलते हैं तो मुस्कान आपके चेहरे पर रहती है।ऑल द बेस्ट कॉमेडी ऑव एरर्स जैसा ही मसला है जब एक म्यूजिक बैंड को कामयाब करने के लिए एक स्ट्रगलर भाई ने अपने अमीर एनआरआई भाई को झूठ बोल दिया है कि उसने शादी कर ली है और भाई ने उसकी पॉकेट मनी बढा दी है। एक दिन अचानक भाई की लोशोटो जाने वाली फ्लाइट की इमरजेंसी लेंडिग गोवा हो जाती है और उनका भाई बेवक्त उनके घर पहुंच जाता है। उसने अपने छोटे भाई की पत्नी से मिलने की इच्छा व्यक्त की है, उसे अपराधबोध है कि वो शादी में नहीं आ पाया था। लेकिन गलती है वह दूसरी लड़की को अपने भाई की पत्नी समझ लेता है। जबकि उसने शादी ही नहीं की है और एक लड़की सिर्फ उसकी गर्लफे्रंड है। एक झूठ को छुपाने के लिए सैकड़ों झूठों का सहारा लेना पड़ता है और हर झूठ के साथ लेखक और निर्देशक ने आपके हंसने का मसाला गुण ओर मात्रा के लिहाज से बढ़ा दिया है लिहाजा इंटरवल तक धीमी गति से चलने वाली कामेडी एक्सप्रेस उसके बाद थोड़ी गति पकड़ती है और गंतव्य तक जाती है। बीच बीच में मोहित शेट्टी ने अपनी चिरपरिचित अदा में फिल्म को नॉन लीनियर भी करते हैं, मसलन, एक एक्शन दृश्य की शुरूआत से पहले संजय को गुंडा पूछता है, ए अंकल, कॉमेडी कर रहे हो क्या? तो संजय का जवाब है, बेटा, कॉमेडी तो अब शुरू की है, एक्शन तो तीस साल से कर रहा हूं। कुल मिलाकर ऑल द बेस्ट मोहित शेट्टी की परम्परा की फिल्म है और उस पर लिखने से ज्यादा वह आपको देखने से समझ में आएगी।