शुक्रवार, १८ जून २०१०

सीता की दुविधा, रामकथा का नया रूप


फिल्म समीक्षा: रावण

निर्देशक मणिरत्नम की फिल्म ‘रावण’ दो घंटे बीस मिनट चलने वाला एक ड्रामा है, जिसकी कहानी के कुछ हिस्सों से आप परिचित हैं, कुछ नए हैं। लाल माटी वह एरिया है जहां वीरा की सत्ता है। कुछ के लिए वह रॉबिनहुड और कुछ के लिए रावण है। इलाके में जो नया एसपी देव आया है उसकी बीवी का अपहरण उसने किया है। इसका कारण आधी फिल्म के बाद आपको समझ में आता है और नए दौर की इस रामकथा का पन्ने खुलते है। बीरा की मुंहबोली बहन के साथ पुलिस की ज्यादती और उसका प्रतिशोध। क्या रामायण हमें इस नजरिए से पढाई गई कि किसी की बहन के नाक कान काट लेने की परिणति सीता के अपहरण में हुई। असल में बार बार हमें बताया गया कि राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। जैसा कि फिल्म की नायिका रागिनी कहती है, ‘देव, भगवान हैं।’ जब तक वह अपने देव का इंतजार रही है, तो वीरा की बहन के साथ हुई ज्यादती को लेकर वह दुविधा में है कि देव सही है कि वीरा, लेकिन जब वीरा को मारने के लिए देव ने उसे मोहरा बनाया, तो उसकी दुविधा खत्म होती है और वह वीरा और देव गोली के बीच में तनकर खड़ी हो जाती है। वीरा उसे धकेलते हुए कहता है कि हटो रागिनी, चलाने दो गोली ताकि दुनिया को पता चले कि असली रावण कौन है? रामकथा में जहां राम के गलत होने के सबूत मिलते हैं, वहां कवि ने मदद ली कि रावण का मोक्ष राम के ही हाथों होना है, इसलिए यह सब लीला है। चौदह दिन वीरा की हिरासत में रहकर लौटी रागिनी को जब उसका पति शक की नजर से देखता है तो उसका आत्म-सम्मान दांव पर है।

फिल्म के सारे मुख्य पात्र रामकथा से मिलाए जा सकते हैं। फोरेस्ट गार्ड गोविंदा हनुमान, पुलिस अफसर की भूमिका में निखिल द्विवेदी लक्ष्मण, रावण के दो भाई, रागिनी में सीता की छवि दिखती है। शांति का संदेश लेकर गए वीरा के विभीषण भाई को देव मार देता है।
असल में यह आधुनिक रामकथा है, जहां असली सत्ता जिन लोगों के हाथ में हैं। उन्हें हम राम समझते हैं वे सीधे सादे लोगों को रावण बनाकर मारने के बहाने ढूंढ़ते हैं। यहां वीरा में हल्का सा चेहरा एक नक्सली नेता का उभरता है, जो अपने ही समुदाय में लोकप्रिय है लेकिन रोजा, युवा जैसे राजनीतिक कथासूत्र यहां से गायब हैं। अंतिम विजय राम की ही होती है, जिसे हमारा दर्शक भी मंजूर करता है। अद्भुत फिल्मांकन ही पैसा वसूल है। हालांकि फिल्मों के चरित्रों को गहरा करने की गुंजाइश बनती थी। बहुत बातें अनकही रहीं। अभिषेक कुछ दृश्यों में तो बेहतरीन लगे हैं लेकिन कई जगह उनकी पोल भी खुलती है। विक्रम ठीक हैं। गोविंदा और रविकिशन की प्रतिभा का दोहन नहीं हुआ। रहमान का संगीत ओर गुलजार के गीत पहले ही औसत लोकप्रियता हासिल कर चुके हैं। इसके बावजूद फिल्म में लगातार एक ड्रामा है और वह अच्छी लगती है। इस आधुनिक रामायण को आप सपरिवार देख सकते हैं।

17 comments:

mrityunjay kumar rai ने कहा…

a balanced film review

'उदय' ने कहा…

...आप की कलम से ऎसा लग रहा है कि फ़िल्म में दमखम नहीं है!!!!

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

manoranjak movie

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Maria Mcclain ने कहा…

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अमित शर्मा ने कहा…

a balanced film review

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

अभिषेक की पोल किधर से खुली?

निर्मला कपिला ने कहा…

ाच्छी समी़अ है देखते हैं आभार

आशीष ने कहा…

मतलब फिल्म देखने नहीं जाऊं

गुस्ताख़ मंजीत ने कहा…

Gurudev, Technically film is very good, lekin kahani ke level pe mazedar nahi, yaar MAHABHARAT ke naam per RAJNEETI aur RAMAYANA ke naam per RAVAN...darshko ke hath me thame dee GEETA, Film dekho kuch UMMID mat karo chhe wo P jha ho ya mani ratnam.

आनन्‍द पाण्‍डेय ने कहा…

जानकारी के लिये धन्‍यवाद

शरद कोकास ने कहा…

फिल्म की कहानी स्वाभाविक लगती है लेकिन पात्रों का अभिनय कई स्थानों पर स्वाभाविक नहीं लगता । और पात्र और परिवेश के अनुसार अभिषेक के नक्सली मेता होने का तो कहीं भी भ्रम पैदा नहीं होता बल्कि यह पात्र दस्यु पात्र के अधिक करीब लगता है । गीत और नृत्य जबरन ठूँसे हुए लगते हैं । इस कहानी को और अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता था यदि निर्देशक रामायण के मिथक से मुक्त हो जाते ।

Udan Tashtari ने कहा…

देखते हैं मौका लगते ही इस फिल्म को!

ramkumar singh ने कहा…

अपनी प्रतिक्रियाओं के लिए सभी मित्रों का आभार।

Sarita ने कहा…

सुंदर एवं सटीक समीक्षा...
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smsinhindi.com ने कहा…

Mai abhi planning kar raha tha is film ko dekhane ki lekin delhi ki busy life me waqt hi nahi milata hai. aapki samiksha padhkar puri film ki kahani ka pata chal gaya . Shayad ab mujhe is movie ko dekhne ki jarurat nahi hogi.

फ़्र्स्ट्रू ने कहा…

अरे इतनी भी बुरी नही है भाई. आपने तो इज्ज़त उतार दी.

S.M.HABIB ने कहा…

"रावन" में देखने लायक क्या है? मणिरत्नम, रहमान और गुलज़ार जैसे "गहरे पानी में पईठने वाले सर्जक" किनारे बैठ कर बालू में कुछ खोजते नजर आते हैं.